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लेखनी कहानी -12-Jan-2026

इतना प्यारा तो मंजर कहीं भी नहीं। आप सा प्यारा दिलबर कहीं भी नहीं। 🌹 रुख दरख्शां लगे माहे अंजुम मगर। तेरे जैसा तो अख्तर कहीं भी नहीं। 🌹 कोई तुम सा नहीं बेमिसाल आप हो। हुस्न का ऐसा पैकर कहीं भी नहीं। 🌹 चल पड़ा हूं मैं राहों में अंजान हूं। मील का कोई पत्थर कहीं भी नहीं। 🌹 किस से जाकर के इंसाफ मांगे कोई। कोई अब अपना रहबर कहीं भी नहीं। 🌹 वक्त पर काम हो जाए मज़लूम का। आज कल ऐसा दफ़्तर कहीं भी नहीं। 🌹 अपने घर में बुजु़र्गो को लगता है डर। आज कल ऐसे बे घर कहीं भी नहीं। 🌹 दर्द मंदों को अपनाए मज़लूम को। अब "सगीर" ऐसा सरवर कहीं भी नहीं।

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1 Comments

Pranav kayande

17-Jan-2026 01:17 PM

Very nice

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